ड़ा भंगाल और गिरिपार क्षेत्र की परिस्थितियां विकट हैं। बेशक यहां के लोगों को इन परिस्थितियों
में रहने की आदत हो चुकी हो, मगर इनका भी हक है कि वे भी सामान्य जीवन
व्यतीत करें, जिनके बारे में कोई नहीं सोच रहा। राजनीतिक मंशा भी इनको इनका
हक दिलाने में कामयाब नहीं हुई है। बार-बार इन क्षेत्रों को ट्राइबल घोषित
करने की मांग उठ रही है, लेकिन आज तक इस तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया। एक
तरफ ये क्षेत्र हैं जिन्हें ट्राइबल के दर्जे की जरूरत है और दूसरी तरफ कई
क्षेत्र ऐसे हैं, जिन्हें ट्राइबल का दर्जा तो मिल चुका है, लेकिन वहां के
लोग यहां रहते ही नहीं और दूसरे स्थानों में जाकर सुख-सुविधाएं भोग रहे
हैं। राजनीतिक दल इन क्षेत्रों को ट्राइबल घोषित करने के वादे तो करते हैं
और बयानबाजी भी काफी होती है, परंतु नतीजा कुछ नहीं निकल सका। अभी भी इनकी
मांग जस की तस है।
बड़ा भंगाल पर कोई स्टडी ही नहीं
दूसरी तरफ बड़ा भंगाल
जिसकी और भी अधिक विकट परिस्थितियां हैं, वहां के लिए अभी तक अध्ययन भी
नहीं हो सका है। प्रदेश सरकार का जनजातीय विकास विभाग ट्राइबल घोषित करने
की मांग को लेकर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से एक विशेष अध्ययन करवाता
है, जिसमें क्षेत्र की परिस्थितियों, वहां की संस्कृति, लोगों के रहन-सहन
और जनसंख्या को आधार माना जाता है, जिसके साथ लोगों की आर्थिक स्थिति देखते
हुए उसे ट्राइबल घोषित किया जाता है। बड़ा भंगाल को राशन पहुंचाने के लिए
भी सरकार को हेलिकाप्टर तक का सहारा लेना पड़ता है। इस बार हेलिकाप्टर के
माध्यम से वहां राशन पहुंचा, जिससे लोगों का आने वाले समय का गुजारा चलेगा।
बर्फबारी के दौरान इन क्षेत्रों में बिजली तक की व्यवस्था नहीं होती। यहां
सोलर लाइट सिस्टम के लिए सरकार प्रयास कर रही है। इस तरह की कठिनाइयों के
बावजूद यहां के लोगों को आज तक ट्राइबल का दर्जा नहीं मिल सका, जहां के
युवा इसके हकदार हैं।
विशेष अध्ययन में ट्राइबल की संभावनाएं
सिरमौर जिला के गिरिपार क्षेत्र को ट्राइबल का दर्जा दिलाने के लिए काफी कसरत हो चुकी है। इसके लिए एक विशेष
अध्ययन करवाया गया है, जिसमें गिरिपार को ट्राइबल घोषित करने की सभी
संभावनाएं सही पाई गई हैं। इस रिपोर्ट के बाद ट्राइबल के दर्जे के लिए
प्रदेश सरकार ने मामला केंद्र सरकार को भेजा है। केंद्र सरकार के जनजातीय
आयोग व संबंधित मंत्रालय से मामला उठाया है। यहां तक कि प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी से इस मुद्दे पर बात हुई है, वहीं भाजपा के सांसद लगातार
दिल्ली में यह मामला उठा रहे हैं। लोकसभा में भी गिरिपार को ट्राइबल के
दर्जे पर चर्चा हो चुकी है, परंतु हैरानी की बात है कि आज दिन तक कोई फैसला केंद्र सरकार इस पर नहीं ले पाई है।
राशन पहुंचाना चुनौती
बड़ा भंगाल में रहने वाले लोगों का रहन-सहन बड़ा ही साधारण है। बड़ा भंगाल में रहने वाली आबादी का गुजर बसर भी
प्रकृति के संसाधनों के अलावा खेती पर निर्भर करता है। यहां लोग विभिन्न
सब्जियों की खेती करते हैं। इतना ही नहीं गांव में रहने वाले लोगों को
सरकार तथा जिला प्रशासन द्वारा भी राशन उपलब्ध करवाया जाता है। गर्मियों के
मौसम में गांव के लोगों को आवश्यक खाद्य सामग्री की उपलब्धता करवाई जाती
है, लेकिन मौसम खराब होने की स्थिति में गांव तक राशन पहुंचाना भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। वहीं गांव के लोग पशुआें को पालते हैं।
जहां सुख-सुविधाएं वे वहां रहते ही नहीं
एक तरफ प्रदेश का गिरिपार और बड़ा भंगाल
ट्राइबल दर्जे की मांग कर रहा है, तो दूसरी तरफ जिन क्षेत्रों को यह दर्जा
मिला है, वहां के लोग दूसरे क्षेत्रों में जाकर सुख-सुविधाएं भोग रहे हैं।
उन क्षेत्रों के लोगों को ट्राइबल के दर्जे की जरूरत ही नहीं है बावजूद
इसके वे लाभ उठा रहे हैं। भरमौर, लाहुल-स्पीति व किन्नौर को देखें, तो आज
वहां के ट्राइबल का दर्जा हासिल लोग कहीं दूसरे स्थानों पर रह रहे
हैं। समूचा भरमौर आज कांगड़ा जिला में बसा हुआ है, लाहुल-स्पीति के लोग
कुल्लू- मनाली में निवास कर रहे हैं, किन्नौर के लोगों का डेरा शिमला व
सोलन में लगा है। ऐसे में इन लोगों को सरकारी सुख-सुविधाओं का लाभ मिल रहा है, लेकिन जिन्हें मिलना चाहिए, उन्हें नहीं मिल पा रहा। कई लोग ऐसे भी
हैं, जो अपना ट्राइबल क्षेत्र नहीं छोड़ते, क्योंकि उन्हें वहां रहने का
पूरा लाभ मिल रहा है। वे लोग अपनी संस्कृति नहीं छोड़ सकते और उसी रहन-सहन
में ढले हुए हैं। गिरिपार और बड़ा भंगाल में सरकारी अदारे की भी भारी कमी
है। यहां सामान्य क्षेत्रों से कोई जाने को भी तैयार नहीं होता। बमुश्किल
यहां सरकारी सेवाएं मिल पा रही हैं। ऐसे में वहां की व्यवस्था और
परिस्थितियों को देखते हुए केंद्र सरकार को तुरंत इन क्षेत्रों को ट्राइबल
घोषित करना चाहिए। इसके लिए राज्य सरकार को भी गंभीरता से कदम उठाने चाहिएं
अन्यथा यहां के लोग अभी और कई साल तक ट्राइबल का अधिकार हासिल नहीं कर
पाएंगे।
राजा भगालियां ने रखी थी रानी
बड़ा भंगाल में वर्तमान समय में रह रहे
लोगों के अनुसार मानव सभ्यता की कहानी का पुख्ता कोई भी ब्यौरा नहीं है,
लेकिन पूर्वजों की सुनाई बातों के अनुसार राजा भगालियां ने अपनी एक रानी को
इस दुर्गम क्षेत्र में रखा था और उसकी सेवा के लिए कई परिवार वहां स्थापित
कर दिए, जिसके बाद सभी लोग रानी को देवी की तरह पूजते थे और रानी का अपना
ही राज पाठ वहां चलता था। रानी की मृत्यु के बाद सेवादार परिवारों के भी
आगे अपने परिवार हो गए थे, जिसके बाद लोगों ने जिंदगी वहीं पर व्यतीत करना
शुरू कर दी।
लोगों ने ही किया था ट्राइबल दर्जे का विरोध
बड़ा भंगाल क्षेत्र के लोगों को ट्राइबल
का दर्जा दिलाने के लिए जब मुहिम शुरू हुई और जनजातीय आयोग ने धर्मशाला के
प्रयास भवन में सरकारी अधिकारियों के साथ बैठक की थी। आयोग के सदस्यों ने
धर्मशाला के बाद बैजनाथ में भी संबंधित क्षेत्र के लोगों से मिलकर उनके
विचार और समस्याएं सुनी थीं। इस दौरान उस क्षेत्र के अनुसूचित जाति के
लोगों ने बड़ा भंगाल के लोगों को ट्राइबल का दर्जा देने का कड़ा विरोध किया
था। अनुसूचित जाति के लोगों ने यह कहकर आयोग के समक्ष आपत्ति जताई थी कि
वहां रहने वाले लोग उन्हें मंदिरों में नहीं जाने देते, पानी के स्रोतों का
सार्वजनिक प्रयोग नहीं करने देते। हालात ऐसे हैं कि कुछ रास्तों से भी
गुजरने पर आपत्ति जताई जाती है।
गपशप और ताश-पत्ते खेलने में मनोरंजन
पहाड़ों के बीच बह रही रावी के किनारे बसे
दुर्गम क्षेत्र बड़ा भंगाल में लोगों को मनोरंजन के कोई भी साधन नहीं हैं,
लेकिन इसके बावजूद लोग घरों के रोजाना किए जाने वाले कार्यों से निजात
पाकर गांव के मध्य स्थान पर एकत्रित होते हैं। इसमें लोग अपनी मौज-मस्ती की
गपशप और ताश-पत्ते खेलकर समय व्यतीत करते हैं।
पता नहीं, दुनिया है कैसी
प्रदेश के अति दुर्गम क्षेत्र बड़ा भंगाल
के बुजुर्ग लोगों ने इच्छा जताते हुए बताया कि कुछ समय पूर्व बड़ा भंगाल
में डीसी कांगड़ा आए थे, उस समय बुजुर्गों ने इच्छा जाहिर की थी कि उनके
लिए एक बार हेलिकाप्टर भेजा जाए और उन्हें एक बार बीड़ या बैजनाथ की दुनिया
भी दिखाई जाए। उन लोगों ने बताया कि वे लोगों से सुनते हैं कि दुनिया में
कई कुछ है। बुजुर्ग पहाड़ों से निकलकर यह दुनिया देखना चाहते हैं, लेकिन इस
दूरदराज के क्षेत्रों के बुजुर्गों की सुनने वाला कोई नहीं है।
ट्राइबल्स की तरह दे रहे सुविधाएं
कांगड़ा संसदीय क्षेत्र के सांसद शांता
कुमार का कहना है कि बड़ा भंगाल गए अभी तो बहुत समय हो गया है, लेकिन बड़ा
भंगाल की परिस्थितियों से वह भली तरह से वाकिफ हैं। उस क्षेत्र के लोग अब
निचले क्षेत्रों में भी आते-जाते रहते हैं। केंद्र व राज्य सरकार ने बड़ा
भंगाल ही नहीं, इस तरह के पिछड़े क्षेत्रों के लिए विशेष योजनाएं तैयार कर
काम शुरू कर दिए गए हैं। दोनों ही सरकारें अंत्योदय की भावना से काम कर रही
हैं। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उस क्षेत्र के लोगों की समस्याएं सुलझाने
और उन्हें मूलभूत सुविधाएं समय पर देने के लिए सरकार व प्रशासन से कई बार
मामला उठाया है, जिसके फलस्वरूप वहां काम भी हुए हैं, लेकिन क्षेत्र इतना
दुर्गम और दूरस्थ है कि कमियां रह जाती हैं। क्षेत्र में बिजली, पानी,
स्कूल व स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए सरकार लगातार प्रयासरत है। इसके बावजूद
जो भी कमियां वहां के स्थानीय लोग और प्रतिनिधि बताते हैं उन्हें हल करने
के लिए अन्य क्षेत्रों के बजाय पिछड़ा क्षेत्र होने के नाते विशेष योजना के
आधार पर काम किया जाता है। सांसद शांता कुमार का कहना है कि बड़ा भंगाल को
ट्राइबल क्षेत्रों की तरह ही सभी तरह की सुविधाएं दी जा रही हैं। उन्होंने
व्यक्तिगत रूप से उस क्षेत्र के लोगों के विकास के लिए लगातार प्रयास किए
हैं।
केंद्र सरकार देगी राहत
जनजातीय विकास मंत्री रामलाल मार्कंडेय का
कहना है कि गिरिपार व बड़ा भंगाल में वाकई परिस्थितियां कठिन हैं। वहां की चिंता प्रदेश सरकार को है, जिसे देखते हुए ही दोनों क्षेत्रों को ट्राइबल
घोषित करने का मामला केंद्र सरकार को भेजा गया है। इस पर फैसला केंद्र
सरकार को लेना है, जो जल्द ही राहत प्रदान करेगी। इन क्षेत्रों में प्रदेश
सरकार सभी तरह की सुविधाएं देने के लिए प्रयासरत रहती है, क्योंकि अभी
ट्राइबल में ये एरिया नहीं हैं, इसलिए उनके महकमे की ओर से कोई विशेष कदम
यहां नहीं उठाए जा सकते।
चुनाव से नहीं जोड़ा जा सकता मुद्दा
सिरमौर जिला के गिरिपार क्षेत्र को ट्राइबल घोषित करने को लेकर जितने प्रयास दस साल में हुए हैं, वे लोगों को
सामने दिखाई देते हैं। शिमला लोकसभा सीट के सांसद व भाजपा नेता प्रो.
वीरेंद्र कश्यप का कहना है कि वर्तमान में हाटी का मुद्दा केंद्र सरकार के
पास चर्चा के लिए है। हाल ही में हिमाचल सरकार ने यह मुद्दा केंद्र सरकार
को भेजा है तथा केंद्र सरकार इस पर अपनी टिप्पणी कर इसे रजिस्ट्रार जनरल ऑफ
इंडिया आरजीआई को भेजेगी। आरजीआई हिमाचल सरकार द्वारा भेजी गई रिपोर्ट का
अवलोकन करेगी। उन्होंने कहा कि वह सिरमौर जिला के गिरिपार क्षेत्र की लगभग
सभी पंचायतों का दौरा कर चुके हैं तथा क्षेत्र की भौगोलिक व सभी प्रकार की
स्थिति से भलीभांति परिचत हैं। प्रो. कश्यप ने बताया कि गिरिपार क्षेत्र को
जोंसार बाबर की तर्ज पर ट्राइबल का दर्जा मिलना चाहिए तथा इस बारे में
लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर,
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डा. राजीव सहजल, विधायक सुरेश कश्यप,
पूर्व विधायक बलदेव तोमर समेत केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की गई है।
132 पंचायतें छह दशक से कर रहीं संघर्ष
जिला सिरमौर के हाटी समुदाय का मुद्दा छह
दशक से भी अधिक समय से दिल्ली सरकार की फाइलों में अठखेलियां खेल रहा है।
गिरिपार क्षेत्र के लाखों लोगों की उम्मीदों पर दशकों से पानी फिर रहा है।
जनजातीय क्षेत्र के दर्जे को लेकर हाटी समुदाय के लोग छह दशक से भी अधिक से
अपनी मांग प्रदेश व केंद्र सरकार तक पहुंचा रहे हैं, परंतु अभी भी गिरिपार
क्षेत्र जनजातीय घोषित नहीं हो पाया है। हाटी समुदाय के करीब पौने तीन लाख
लोग हर बार विधानसभा व लोकसभा चुनाव में एक बार अपनी मांग दोहराते हैं तथा
उम्मीद की किरण उनको कहीं दूर नजर आती है। हैरानी की बात तो यह है कि पूरा गिरिपार क्षेत्र व उत्तराखंड का जोंसार बाबर क्षेत्र दोनों तमाम
प्रक्रियाओं में एक साथ पले बड़े हैं तथा दोनों ही क्षेत्रों के
रीति-रिवाज, रहन-सहन, सांस्कृतिक गतिविधियां हू-ब-हू एक समान हैं।
उत्तराखंड के जोंसार बाबर की करीब 124 पंचायतें 1967 में ट्राइबल घोषित हो
चुकी हैं, जबकि इसके बिलकुल सामांनातर गिरिपार क्षेत्र की 132 पंचायतें अभी
भी ट्राइबल के लिए संघर्ष कर रही हैं।
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