रीलंका की तरह म्यांमार भी अपने ऊपर बढ़ते चीनी कर्ज़ के चलते दबाव महसूस करने लगा है. यही वजह है कि वह बीआरआई से हटना चाह रहा है.
म्यांमार के रख़ाइन प्रांत में क्योकप्यू शहर के तट पर चीन पानी के अंदर एक बंदरगाह बनाने पर काम कर रहा है.
इसकी शुरुआती कीमत 730 करोड़ डॉलर आंकी गई लेकिन हाल ही में म्यांमार के उप वित्त मंत्री सेट ऑन्ग ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया
इंडोनेशिया में बन रहा जकार्ता-बांडुंग हाई-स्पीड रेलवे नेटवर्क लगातार पीछे खिसकता जा रहा है, इसकी प्रमुख वजहों में भूमि अधिग्रहण, लाइसेंस और फ़ंड की समस्या है.
500 करोड़ डॉलर की चीन की यह परियोजना साल 2015 में शुरू हुई थी और इसकी डेडलाइन साल 2019 है.
जकार्ता ग्लोब में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इंडोनेशिया के नेता लुहुत पंडजाइतन ने कहा है कि फिलहाल को ऐसा लगता है कि साल 2014 से पहले इस नेटवर्क पर रेल नहीं चल पाएगी.
इससे पहले इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो भी इस प्रोजेक्ट पर दोबारा विचार करने की बात कह चुके हैं क्योंकि जकार्ता से बांडुंग की दूरी महज 140 किलोमीटर ही है.
वहीं दूसरी तरफ चीनी मीडिया में इस प्रोजेक्ट को काफी सफल बताया जा रहा है और ऐसे रिपोर्ट की जा रही है कि इस प्रोजेक्ट के चलते इंडोनेशिया में कई स्थानीय लोगों को नौकरियां मिली हैं.
इंडोनेशिया में अगले साल चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में यहां चीन-विरोधी विचार भी लगातार उठ रहे हैं.
था कि यह प्रोजेक्ट लगातार छोटा होता जा रहा है.
अब इस प्रोजेक्ट को कम करके इसका खर्च 130 करोड़ डॉलर पर लाया जा चुका है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट के लगातार घटते चले जाने के पीछे खर्च के साथ-साथ चीन की अपने पड़ोसी देशों में कब्ज़ा जमाने वाली छवि भी है. इसी डर के चलते म्यांमार चीन के साथ इस परियोजना बहुत ज़्यादा बड़ा नहीं बनाना चाहता.
साल 2011 में म्यांमार सरकार ने चीन के साथ 360 करोड़ डॉलर वाली मितसोन बांध परियोजना इसी वजह से रद्द कर दी थी क्योंकि उस समय भी म्यांमार के आम नागरिकों और विपक्षी दलों ने चीन का विरोध किया था.
हालांकि तमाम रुकावटों के बावजूद, चीन लगातार म्यांमार के समर्थन में बना रहा फिर चाहे रोहिंग्या संकट पर म्यांमार की चौतरफा आलोचना का ही विषय क्यों न हो.
जब लाहौर की सबसे बड़ी आईटी मार्केट हफ़ीज़ सेंटर के मेन गेट पर कई दिन नोटिस लगा हुआ कि हम अहमदियों से व्यापार नहीं करते, अहमदी लोग इस मार्किट में दाख़िल न हों, तो मैंने दिल को तसल्ली दी कि मार्केट वाले तो कारोबारी लोग होते हैं उन्हें इससे क्या कि किसका धर्म-नज़रिया क्या है.
ज़रूर ये कि किसी शरारती मौलवी की हरकत है. तभी तो कुछ दिन बात पुलिस ने ये नोटिस उतरवा दिया.
पाकिस्तान में पिछले कई वर्षों से छह सितंबर को रक्षा दिवस मनाया जाता है. पाकिस्तानी इतिहास में बताया जाता है कि 6 सितंबर 1965 को भारत ने पाकिस्तान पर हमला किया और पाकिस्तानी फौज ने जान पर खेलकर ये हमला नाकाम कर दिया.
इस युद्ध के कई हीरो भी हैं. छह सितंबर को पाकिस्तान के सभी अख़बार ख़ास संस्करण भी निकालते हैं जिनमें बीसियों इश्तिहार भी छपते हैं. स बार ऐसा हुआ कि अहमदी समुदाय की ओर से उर्दू के एक बड़े जाने-माने पुराने अख़बार नवाए वक़्त में 65 के युद्ध से अब तक वतन पर जवान क़ुर्बान करने वाले 14 अहमदी फ़ौजी अफ़सरों की तस्वीरों वाला विज्ञापन छापा गया. इनमें से कई अफ़सर ऐसे भी थे जिनकी तस्वीरें एक ज़माने तक स्कूली क़िताबों में हीरो के तौर पर शामिल थीं.
बस फिर क्या था, नवाए वक़्त को इतनी गालियां पड़ीं कि उसे माफ़ी छापनी पड़ी कि हमने ग़लती से ये इश्तिहार छाप दिया, अल्लाह मुसलमानों का दिल दुखाने पर हमें माफ़ करे.
मैं तबसे सोच रहा हूं कि इस इश्तिहार में देश पर जान देने वाले जिन-जिन पाकिस्तानी सैनिकों की तस्वीरें हैं उनको अब क्या लिखूं. ये कि ये वो सिपाही हैं जो वतन की हिफ़ाज़त करते हुए स्वर्गवासी हो गए या फिर वतन की हिफ़ाज़त करते हुए नरकवासी हो गए?
म्यांमार के रख़ाइन प्रांत में क्योकप्यू शहर के तट पर चीन पानी के अंदर एक बंदरगाह बनाने पर काम कर रहा है.
इसकी शुरुआती कीमत 730 करोड़ डॉलर आंकी गई लेकिन हाल ही में म्यांमार के उप वित्त मंत्री सेट ऑन्ग ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया
इंडोनेशिया में बन रहा जकार्ता-बांडुंग हाई-स्पीड रेलवे नेटवर्क लगातार पीछे खिसकता जा रहा है, इसकी प्रमुख वजहों में भूमि अधिग्रहण, लाइसेंस और फ़ंड की समस्या है.
500 करोड़ डॉलर की चीन की यह परियोजना साल 2015 में शुरू हुई थी और इसकी डेडलाइन साल 2019 है.
जकार्ता ग्लोब में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इंडोनेशिया के नेता लुहुत पंडजाइतन ने कहा है कि फिलहाल को ऐसा लगता है कि साल 2014 से पहले इस नेटवर्क पर रेल नहीं चल पाएगी.
इससे पहले इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो भी इस प्रोजेक्ट पर दोबारा विचार करने की बात कह चुके हैं क्योंकि जकार्ता से बांडुंग की दूरी महज 140 किलोमीटर ही है.
वहीं दूसरी तरफ चीनी मीडिया में इस प्रोजेक्ट को काफी सफल बताया जा रहा है और ऐसे रिपोर्ट की जा रही है कि इस प्रोजेक्ट के चलते इंडोनेशिया में कई स्थानीय लोगों को नौकरियां मिली हैं.
इंडोनेशिया में अगले साल चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में यहां चीन-विरोधी विचार भी लगातार उठ रहे हैं.
था कि यह प्रोजेक्ट लगातार छोटा होता जा रहा है.
अब इस प्रोजेक्ट को कम करके इसका खर्च 130 करोड़ डॉलर पर लाया जा चुका है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट के लगातार घटते चले जाने के पीछे खर्च के साथ-साथ चीन की अपने पड़ोसी देशों में कब्ज़ा जमाने वाली छवि भी है. इसी डर के चलते म्यांमार चीन के साथ इस परियोजना बहुत ज़्यादा बड़ा नहीं बनाना चाहता.
साल 2011 में म्यांमार सरकार ने चीन के साथ 360 करोड़ डॉलर वाली मितसोन बांध परियोजना इसी वजह से रद्द कर दी थी क्योंकि उस समय भी म्यांमार के आम नागरिकों और विपक्षी दलों ने चीन का विरोध किया था.
हालांकि तमाम रुकावटों के बावजूद, चीन लगातार म्यांमार के समर्थन में बना रहा फिर चाहे रोहिंग्या संकट पर म्यांमार की चौतरफा आलोचना का ही विषय क्यों न हो.
जब लाहौर हाई कोर्ट के वकीलों के एक
गुट ने छह वर्ष पहले अदालत के आसपास की कैंटीनों में शीज़ान कोल्ड ड्रिंक
कंपनी का बहिष्कार किया तो बड़ा आश्चर्य हुआ कि जिन वकीलों की रोज़ी-रोटी
ही क़ानून से जुड़ी हुई है वो ऐसी बचकाना हरकत कैसे कर सकते हैं?
माना
शीज़ान कंपनी का मालिक अहमदी समुदाय से है मगर कारोबार करना तो हर नागरिक
का हक़ है. इस पर कोई कैसे रोक लगा सकता है और वह भी वकील बिरादरी की ओर
से.जब लाहौर की सबसे बड़ी आईटी मार्केट हफ़ीज़ सेंटर के मेन गेट पर कई दिन नोटिस लगा हुआ कि हम अहमदियों से व्यापार नहीं करते, अहमदी लोग इस मार्किट में दाख़िल न हों, तो मैंने दिल को तसल्ली दी कि मार्केट वाले तो कारोबारी लोग होते हैं उन्हें इससे क्या कि किसका धर्म-नज़रिया क्या है.
ज़रूर ये कि किसी शरारती मौलवी की हरकत है. तभी तो कुछ दिन बात पुलिस ने ये नोटिस उतरवा दिया.
पाकिस्तान में पिछले कई वर्षों से छह सितंबर को रक्षा दिवस मनाया जाता है. पाकिस्तानी इतिहास में बताया जाता है कि 6 सितंबर 1965 को भारत ने पाकिस्तान पर हमला किया और पाकिस्तानी फौज ने जान पर खेलकर ये हमला नाकाम कर दिया.
इस युद्ध के कई हीरो भी हैं. छह सितंबर को पाकिस्तान के सभी अख़बार ख़ास संस्करण भी निकालते हैं जिनमें बीसियों इश्तिहार भी छपते हैं. स बार ऐसा हुआ कि अहमदी समुदाय की ओर से उर्दू के एक बड़े जाने-माने पुराने अख़बार नवाए वक़्त में 65 के युद्ध से अब तक वतन पर जवान क़ुर्बान करने वाले 14 अहमदी फ़ौजी अफ़सरों की तस्वीरों वाला विज्ञापन छापा गया. इनमें से कई अफ़सर ऐसे भी थे जिनकी तस्वीरें एक ज़माने तक स्कूली क़िताबों में हीरो के तौर पर शामिल थीं.
बस फिर क्या था, नवाए वक़्त को इतनी गालियां पड़ीं कि उसे माफ़ी छापनी पड़ी कि हमने ग़लती से ये इश्तिहार छाप दिया, अल्लाह मुसलमानों का दिल दुखाने पर हमें माफ़ करे.
मैं तबसे सोच रहा हूं कि इस इश्तिहार में देश पर जान देने वाले जिन-जिन पाकिस्तानी सैनिकों की तस्वीरें हैं उनको अब क्या लिखूं. ये कि ये वो सिपाही हैं जो वतन की हिफ़ाज़त करते हुए स्वर्गवासी हो गए या फिर वतन की हिफ़ाज़त करते हुए नरकवासी हो गए?
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