जब 1980 के दशक में एंडरसन और उनके साथी पहली बार क्रिस्टल फाल्स आए थे, तो उन्हें लगा कि यहां पर आर्मिलैरिया गैलिशिया की कोई बस्ती आबाद है.
लेकिन, उन्हें बाद में एहसास हुआ कि ये मशरूम तो एक ही जीव है जो कई सदियों
की उम्र का सफ़र तय करते-करते विशाल दैत्याकार जीव में बदल चुका है.
वैज्ञानिकों का अंदाज़ा है कि मशरूम का ये एक पेड़ 91 एकड़ में फैल चुका है. इसका वज़न 100 टन है. और, ये कम से कम 1500 साल पुराना है. उस वक़्त इसे दुनिया का सबसे पुराना जीव माना गया था. हालांकि बाद में अमरीका के ही ओरेगन के जंगल में मिले मशरूम को दुनिया के सबसे पुराने जीव का दर्जा मिला.
एंडरसन कहते हैं कि, 'जब हमने पहली बार अपने पर्चे में इस मशरूम के बारे में दुनिया को बताया, तो हंगामा मच गया. लोगों को लगा कि हम दुनिया को अप्रैल फूल बना रहे हैं. लेकिन, जब हम 2015 में दोबारा क्रिस्टल फाल आए, तो हमें यक़ीन हो गया कि ये मशरूम असल में एक ही जीव है, जो बढ़कर इतना विशाल हो गया है.'
2015 से 2017 के बीच जिम एंडरसन और उनकी टीम ने कई बार यहां का दौरा किया. मशरूम के डीएनए सैंपल लिए और उसे टोरंटो यूनिवर्सिटी की लैब में ले जाकर परीक्षण किया.
नए प्रयोगों से साफ़ हो गया कि ये जीव उनके अंदाज़े से भी ज़्यादा विशाल है. पिछले 1500 बरसों में ये इतना फैल गया है कि इसका वज़न 400 टन से भी ज़्यादा है.
इस मशरूम के डीएनए की पड़ताल से इंसान को उस चमत्कारिक चीज़ को पाने की उम्मीद जगी है, जिसकी बेसब्री से तलाश है.
ये मशरूम हमें कैंसर से लड़ने में मदद कर सकता है.
कनाडा की रिसर्च टीम ने पाया है कि आर्मिलैरिया गैलिशिया के इतने विशाल होने के बावजूद, इसके नए डंठलों के डीएनए में बेहद मामूली बदलाव ही आया है.
जीवों का विकास तब होता है, जब उनके शरीर की कोशिकाएं एक से दो, दो से चार में विभाजित होती जाती है. बार-बार कोशिकाओं के विभाजन से दो कोशिकाओं के डीएनए में फ़र्क़ आने लगता है. जीवों के उम्रदराज़ होने की यही सबसे बड़ी वजह मानी जाती है.
लेकिन, क्रिस्टल फाल्स के मशरूम की कोशिकाओं के लगातार विभाजन के बावजूद इसके डीएनए में कुछ ख़ास बदलाव नहीं देखा गया. इस मशरूम में क़रीब 10 करोड़ जेनेटिक कोड में से केवल 163 मामूली बदलाव ही पाए गए हैं.
जिम एंडरसन कहते हैं कि मशरूम के विस्तार के लिए करोड़ों कोशिकाओं में विभाजन हुए होंगे. फिर, भी जेनेटिक कोड में बदलाव न आना, एक तरह का चमत्कार ही है.
एंडरसन और उनकी टीम मानती है कि मशरूम के अंदर एक छुपी हुई ताक़त है. इसकी वजह से ही कोशिकाओं के लगातार विभाजन के बावजूद इसके बुनियादी डीएनए में बदलाव नहीं आता. ये राज़ खुलने पर हमारे लिए बहुत काम का साबित हो सकता है.
कई तरह के कैंसर में कोशिकाओं के विभाजन पर हमारे दिमाग़ का कंट्रोल ही नहीं रह जाता. कोशिकाएं बेतरतीब ढंग से फैलती जाती हैं. हमारा शरीर उनके विभाजन को रोक नहीं पाता. इसलिए डीएनए के सीक्वेंस में आए बदलाव को रोकने में नाकाम रहता है.
एंडरसन मानते हैं कि आर्मिलैरिया गैलिशिया के डीएनए में बदलान न होने की वजह जानकर हम कैंसर कोशिकाओं के विस्तार को रोक सकते हैं. इस राज़ के पता चलने से हम उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को भी धीमा कर सकते हैं.
फिलहाल एंडरसन और उनकी टीम ने आर्मिलैरिया गैलिशिया के डीएनए में छुपे इस राज़ का पता लगाने का काम दूसरे वैज्ञानिकों पर छोड़ दिया है.
कुकुरमुत्ते हमारी धरती पर बड़ी तादाद में पाए जाते हैं. इनकी कुल तादाद बाक़ी जीवों को मिला दें, तो उनके बराबर बैठती है. कहा जाता है कि हम अभी तक धरती पर मौजूद इनकी सारी नस्लें भी नहीं खोज पाए हैं. वैज्ञानिकों का अंदाज़ा है कि धरती पर कुकुरमुत्तों की 38 लाख किस्में पायी जाती हैं. इनमें से 90 फ़ीसद के बारे में हमें पता ही नहीं. 2017 में ही वैज्ञानिकों ने मशरूम की 2189 नई प्रजातियां खोजी थीं.
इंसान इनका कई तरह से इस्तेमाल करता है. काग़ज़ बनाने से लेकर दवाएं बनाने तक में मशरूम का प्रयोग हो रहा है. इसके अलावा हिपैटाइटिस बी जैसे ख़तरनाक बीमारियों का टीका बनाने में भी यीस्ट का प्रयोग होता है, जो मशरूम के ख़ानदान का ही सदस्य है.
कुकुरमुत्तों का दवाएं बनाने में सबसे चर्चित इस्तेमाल है पेंसिलिन. इसे घरेलू मशरूम से ही खोजा गया था. इसके अलावा भी आज दर्जनों एंटीबायोटिक दवाएं मशरूम की मदद से तैयार होती हैं.
कुकुरमुत्तों की अलग-अलग नस्लों का इस्तेमाल माइग्रेन से लेकर दिल की बीमारियों के इलाज तक में हो रहा है.
ब्रिटेन के किएव स्थित रॉयल बॉटैनिकल गार्डेन के टॉम प्रेस्कॉट कहते हैं कि, 'कीड़ों के भीतर उगने वाले मशरूम के प्रयोग से भी कई दवाएं बनती हैं. ये कीड़ों के इम्यून सिस्टम पर क़ब्ज़ा कर लेते हैं. ऐसा वो इंसानों की रोग प्रतिरोधक क्षमता के साथ भी कर सकते हैं.'
बहुत से वैज्ञानिक मानते हैं कि अभी हमने मशरूम के और भी बहुत फ़ायदों को तलाशा ही नहीं है.
फिनलैंड की वैज्ञानिक रिक्का लिनाकोस्की कहती हैं कि, 'मशरूम से हमें कई वायरल बीमारियों के इलाज में मदद मिल सकती है. इनसे हमें फ्लू, पोलियो, खसरा और दूसरे तरह के बुखार से लड़ने में सहायता हासिल हो सकती है.'
कई कुकुरमुत्तों में एचआईवी और ज़ीका के वायरस से लड़ने की ताक़त पायी गई है.
लिनाकोस्की कहती हैं कि, 'फंगस में ऐसे बहुत से क़ुदरती तत्व हैं, जो हमें बीमारियों से लड़ने में मदद कर सकते हैं. इनसे भविष्य में एंटीवायरल दवाएं बनायी जा सकेंगी.'
लिनाकोस्की एक ऐसी टीम की सदस्य हैं, जो लैटिन अमरीका के कोलम्बिया में मिलने वाली फफूंद से एंटीवायरल दवाएं विकसित करने में जुटी है. हालांकि अभी ऐसी दवाओं को मान्यता नहीं मिली है.
हालांकि लिनाकोस्की को उम्मीद है कि वो दिन दूर नहीं है. वो कहती हैं कि, 'अक्सर फफूंद बेहद मुश्किल हालात में उगते हैं. उनमें चुनौतियों से लड़कर जीने की अथाव ताक़त होती है. दलदली जंगल हों, या फिर सड़ती हुई लकड़ी, वो हर जगह जी लेते हैं. इनसे धरती का कचरा साफ़ करने में भी मदद मिलती है.'
वैज्ञानिकों का अंदाज़ा है कि मशरूम का ये एक पेड़ 91 एकड़ में फैल चुका है. इसका वज़न 100 टन है. और, ये कम से कम 1500 साल पुराना है. उस वक़्त इसे दुनिया का सबसे पुराना जीव माना गया था. हालांकि बाद में अमरीका के ही ओरेगन के जंगल में मिले मशरूम को दुनिया के सबसे पुराने जीव का दर्जा मिला.
एंडरसन कहते हैं कि, 'जब हमने पहली बार अपने पर्चे में इस मशरूम के बारे में दुनिया को बताया, तो हंगामा मच गया. लोगों को लगा कि हम दुनिया को अप्रैल फूल बना रहे हैं. लेकिन, जब हम 2015 में दोबारा क्रिस्टल फाल आए, तो हमें यक़ीन हो गया कि ये मशरूम असल में एक ही जीव है, जो बढ़कर इतना विशाल हो गया है.'
2015 से 2017 के बीच जिम एंडरसन और उनकी टीम ने कई बार यहां का दौरा किया. मशरूम के डीएनए सैंपल लिए और उसे टोरंटो यूनिवर्सिटी की लैब में ले जाकर परीक्षण किया.
नए प्रयोगों से साफ़ हो गया कि ये जीव उनके अंदाज़े से भी ज़्यादा विशाल है. पिछले 1500 बरसों में ये इतना फैल गया है कि इसका वज़न 400 टन से भी ज़्यादा है.
इस मशरूम के डीएनए की पड़ताल से इंसान को उस चमत्कारिक चीज़ को पाने की उम्मीद जगी है, जिसकी बेसब्री से तलाश है.
ये मशरूम हमें कैंसर से लड़ने में मदद कर सकता है.
कनाडा की रिसर्च टीम ने पाया है कि आर्मिलैरिया गैलिशिया के इतने विशाल होने के बावजूद, इसके नए डंठलों के डीएनए में बेहद मामूली बदलाव ही आया है.
जीवों का विकास तब होता है, जब उनके शरीर की कोशिकाएं एक से दो, दो से चार में विभाजित होती जाती है. बार-बार कोशिकाओं के विभाजन से दो कोशिकाओं के डीएनए में फ़र्क़ आने लगता है. जीवों के उम्रदराज़ होने की यही सबसे बड़ी वजह मानी जाती है.
लेकिन, क्रिस्टल फाल्स के मशरूम की कोशिकाओं के लगातार विभाजन के बावजूद इसके डीएनए में कुछ ख़ास बदलाव नहीं देखा गया. इस मशरूम में क़रीब 10 करोड़ जेनेटिक कोड में से केवल 163 मामूली बदलाव ही पाए गए हैं.
जिम एंडरसन कहते हैं कि मशरूम के विस्तार के लिए करोड़ों कोशिकाओं में विभाजन हुए होंगे. फिर, भी जेनेटिक कोड में बदलाव न आना, एक तरह का चमत्कार ही है.
एंडरसन और उनकी टीम मानती है कि मशरूम के अंदर एक छुपी हुई ताक़त है. इसकी वजह से ही कोशिकाओं के लगातार विभाजन के बावजूद इसके बुनियादी डीएनए में बदलाव नहीं आता. ये राज़ खुलने पर हमारे लिए बहुत काम का साबित हो सकता है.
कई तरह के कैंसर में कोशिकाओं के विभाजन पर हमारे दिमाग़ का कंट्रोल ही नहीं रह जाता. कोशिकाएं बेतरतीब ढंग से फैलती जाती हैं. हमारा शरीर उनके विभाजन को रोक नहीं पाता. इसलिए डीएनए के सीक्वेंस में आए बदलाव को रोकने में नाकाम रहता है.
एंडरसन मानते हैं कि आर्मिलैरिया गैलिशिया के डीएनए में बदलान न होने की वजह जानकर हम कैंसर कोशिकाओं के विस्तार को रोक सकते हैं. इस राज़ के पता चलने से हम उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को भी धीमा कर सकते हैं.
फिलहाल एंडरसन और उनकी टीम ने आर्मिलैरिया गैलिशिया के डीएनए में छुपे इस राज़ का पता लगाने का काम दूसरे वैज्ञानिकों पर छोड़ दिया है.
कुकुरमुत्ते हमारी धरती पर बड़ी तादाद में पाए जाते हैं. इनकी कुल तादाद बाक़ी जीवों को मिला दें, तो उनके बराबर बैठती है. कहा जाता है कि हम अभी तक धरती पर मौजूद इनकी सारी नस्लें भी नहीं खोज पाए हैं. वैज्ञानिकों का अंदाज़ा है कि धरती पर कुकुरमुत्तों की 38 लाख किस्में पायी जाती हैं. इनमें से 90 फ़ीसद के बारे में हमें पता ही नहीं. 2017 में ही वैज्ञानिकों ने मशरूम की 2189 नई प्रजातियां खोजी थीं.
इंसान इनका कई तरह से इस्तेमाल करता है. काग़ज़ बनाने से लेकर दवाएं बनाने तक में मशरूम का प्रयोग हो रहा है. इसके अलावा हिपैटाइटिस बी जैसे ख़तरनाक बीमारियों का टीका बनाने में भी यीस्ट का प्रयोग होता है, जो मशरूम के ख़ानदान का ही सदस्य है.
कुकुरमुत्तों का दवाएं बनाने में सबसे चर्चित इस्तेमाल है पेंसिलिन. इसे घरेलू मशरूम से ही खोजा गया था. इसके अलावा भी आज दर्जनों एंटीबायोटिक दवाएं मशरूम की मदद से तैयार होती हैं.
कुकुरमुत्तों की अलग-अलग नस्लों का इस्तेमाल माइग्रेन से लेकर दिल की बीमारियों के इलाज तक में हो रहा है.
ब्रिटेन के किएव स्थित रॉयल बॉटैनिकल गार्डेन के टॉम प्रेस्कॉट कहते हैं कि, 'कीड़ों के भीतर उगने वाले मशरूम के प्रयोग से भी कई दवाएं बनती हैं. ये कीड़ों के इम्यून सिस्टम पर क़ब्ज़ा कर लेते हैं. ऐसा वो इंसानों की रोग प्रतिरोधक क्षमता के साथ भी कर सकते हैं.'
बहुत से वैज्ञानिक मानते हैं कि अभी हमने मशरूम के और भी बहुत फ़ायदों को तलाशा ही नहीं है.
फिनलैंड की वैज्ञानिक रिक्का लिनाकोस्की कहती हैं कि, 'मशरूम से हमें कई वायरल बीमारियों के इलाज में मदद मिल सकती है. इनसे हमें फ्लू, पोलियो, खसरा और दूसरे तरह के बुखार से लड़ने में सहायता हासिल हो सकती है.'
कई कुकुरमुत्तों में एचआईवी और ज़ीका के वायरस से लड़ने की ताक़त पायी गई है.
लिनाकोस्की कहती हैं कि, 'फंगस में ऐसे बहुत से क़ुदरती तत्व हैं, जो हमें बीमारियों से लड़ने में मदद कर सकते हैं. इनसे भविष्य में एंटीवायरल दवाएं बनायी जा सकेंगी.'
लिनाकोस्की एक ऐसी टीम की सदस्य हैं, जो लैटिन अमरीका के कोलम्बिया में मिलने वाली फफूंद से एंटीवायरल दवाएं विकसित करने में जुटी है. हालांकि अभी ऐसी दवाओं को मान्यता नहीं मिली है.
हालांकि लिनाकोस्की को उम्मीद है कि वो दिन दूर नहीं है. वो कहती हैं कि, 'अक्सर फफूंद बेहद मुश्किल हालात में उगते हैं. उनमें चुनौतियों से लड़कर जीने की अथाव ताक़त होती है. दलदली जंगल हों, या फिर सड़ती हुई लकड़ी, वो हर जगह जी लेते हैं. इनसे धरती का कचरा साफ़ करने में भी मदद मिलती है.'
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