जैसे जैसे समय बीतता गया, फ़ातिमा और ग़िनवा भुट्टो की परेशानी बढ़ती गई. जब उनसे नहीं बर्दाश्त हुआ तो उन्होंने अपनी माँ से कहा कि वो अपनी बुआ
'वादी को इस्लामाबाद फ़ोन करने जा रही हैं.
बाद में उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, "मेरे घर के आसपास काफ़ी पुलिस तैनात थी. जब बहुत देर तक मेरे पिता नहीं आए तो मैंने अपनी बुआ को फ़ोन करने का फ़ैसला किया. काफ़ी देर बाद उनके पति आसिफ़ ज़रदारी फ़ोन पर आए."
"उन्होंने कहा कि मैं बुआ से बात नहीं कर सकती. मैंने जब ये कहा कि ये बहुत ज़रूरी है तो उन्होंने कहा कि वो फ़ोन पर नहीं आ सकतीं. जब मैंने बहुत ज़ोर डाला तो उन्होंने बहुत ठंडेपन से कहा कि तुम्हें पता नहीं कि तुम्हारे पिता को गोली लग गई है."
फ़ातिमा और उनकी माँ गिनवा जल्दी से कार में बैठ कर मिडईस्ट अस्पताल पहुंचीं.
बाद में फ़ातिमा भुट्टो ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "मुझे याद है जब मैं अस्पताल में घुसी तो मुझे अपने पिता के पैर दिखाई दिए. मैं समझी कि मैं नीचे गिर डाउंगी. ममी दौड़ कर पापा के पास गईं. वो एक नीची पलंग पर बेहोश लेटे हुए थे. मेरी माँ ज़ोर से चिल्लाईं, 'जागो मीर जागो!"
"मैंने पापा के चेहरे को छुआ. मेरी उंगलियों पर उनका ख़ून लग गया. उनका चेहरा अभी भी गर्म था. मैं इतना घबरा गई कि मैं साँस नहीं ले पा रही थी. बाद में डॉक्टर ग़फ़्फ़ार ने मुझे बताया कि पापा साँस लेन की कोशिश कर रहे थे, लेकिन ले नहीं पा रहे थे."
"उनके गले में इतना ख़ून भर चुका था कि उनके फेफड़ों तक हवा पहुंचाने के लिए ट्यूब नहीं डाली जा सकी. बाद में उनके गले की नली में ट्यूब डालने के लिए छेद किया गया ताकि वो साँस ले सकें. ये सब हो रहा था कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा."
फ़ातिमा ने उनके अंतिम समय का वर्णन करते हुए 'सांग ऑफ़ ब्लड एंड सौर्ड' में लिखा, "पापा कमरे के बीचोंबीच लेटे हुए थे. एक सफ़ेद पतली चादर ने उनकी कॉलर बोन तक के हिस्से को ढ़ंक रखा था. उनकी आँखें मुंदी हुई थीं. उनके चेहरे और बालों पर सूखा ख़ून लगा हुआ था."
"पापा के बाल हमेशा करीने से बने होते थे. वो सिर्फ़ उस समय थोड़ा बिगड़ते थे, जब वो सुबह सो कर उठते थे. मैं अपने पापा के शव के बग़ल में घुटनों के बल बैठ गई और मैंने उनके चेहरे, गालों और होठों का चुंबन लिया."
"मैंने जानबूझ कर उनकी आँखों का चुंबन नहीं लिया क्योंकि लेबनान में एक अंधविश्वास है कि अगर किसी की आँखों की पलकों से आपके होंठ छुल जाएं तो वो हमेशा के लिए आपसे दूर हो जाता है. मैं अपने पापा से दूर होना नहीं चाहती थी."
अपने भाई की मौत की ख़बर सुनकर प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो तुरंत कराची पहुंचीं और नंगे पैर अपने मृत भाई को देखने मिड ईस्ट अस्पताल गईं.
बाद में लरकाना में उन्होंने एक भाव विव्हल भाषण देते हुए कहा, "1977 में जब मार्शल लॉ लगा और सेना सत्ता में आ गई, मीर मुर्तज़ा भुट्टो एक नौजवान शख़्स था. उसे मुल्क छोड़ना पड़ा. सेना की वजह से वो वतन लौट नहीं सके. वो अपने वालिद के आख़िरी दीदार से महरूम रहा."
"वो अपने छोटे भाई शाहनवाज़ को दफ़नाने के लिए भी नहीं आ सका और वो आज वो खुद हमारे बीच मौजूद नहीं है. मीर मुर्तज़ा भुट्टो इस दुनिया से रुख़्सत हो गया लेकिन वो हमारे दिलों में ज़िदा है और हमेशा ज़िदा रहेगा, क्योंकि शहीद कभी नहीं मरते हैं."
मुर्तज़ा भुट्टो के समर्थकों ने आरोप लगाया कि मुर्तज़ा को कराची की पुलिस ने योजना बना कर मारा था.
पुलिस ने पहले सड़क की बत्तियाँ बुझा दीं और फिर मुर्तज़ा के काफ़िले पर गोलियाँ चलाईं. पुलिस ने इसका खंडन किया.
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शुएब सडल ने कहा, "पुलिस भुट्टो के साथ आ रहे बंदूकधारियों को रोकने की कोशिश कर रही थी. जैसे ही उन्हें रुकने का इशारा किया गया, उन्होंने पुलिस पर गोली चला दी और पुलिस को आत्मरक्षा में गोली का जवाब देना पड़ा."
मुर्तज़ा की मौत कई सवाल खड़े कर गई जिनका जवाब आज तक नहीं दिया जा सका है.
5 दिसंबर, 2013 को इस हत्याकांड से जुड़े कई व्यक्तियों को बरी कर दिया गया, लेकिन मुर्तज़ा की बेटी फ़ातिमा इसके पीछे सत्ता से जुड़े कुछ लोगों को दोषी मानती हैं.
उनका कहना है, "ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को 1979 में मारा गया लेकिन उन्हें कभी न्याय नहीं मिला. शाहनवाज़ 1985 में मारे गए लेकिन कभी भी किसी को उनकी मौत का ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया."
"मेरे पिता मुर्तज़ा 1996 में मारे गए और 2009 में पाकिस्तान की एक अदालत ने ये कहा कि उन्हें किसी ने नहीं मारा. 2007 में बेनज़ीर रावलपिंडी में एक रैली में मारी गईं और इस पर कोई पुलिस रिपोर्ट भी नहीं की गई."
बाद में उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, "मेरे घर के आसपास काफ़ी पुलिस तैनात थी. जब बहुत देर तक मेरे पिता नहीं आए तो मैंने अपनी बुआ को फ़ोन करने का फ़ैसला किया. काफ़ी देर बाद उनके पति आसिफ़ ज़रदारी फ़ोन पर आए."
"उन्होंने कहा कि मैं बुआ से बात नहीं कर सकती. मैंने जब ये कहा कि ये बहुत ज़रूरी है तो उन्होंने कहा कि वो फ़ोन पर नहीं आ सकतीं. जब मैंने बहुत ज़ोर डाला तो उन्होंने बहुत ठंडेपन से कहा कि तुम्हें पता नहीं कि तुम्हारे पिता को गोली लग गई है."
फ़ातिमा और उनकी माँ गिनवा जल्दी से कार में बैठ कर मिडईस्ट अस्पताल पहुंचीं.
बाद में फ़ातिमा भुट्टो ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "मुझे याद है जब मैं अस्पताल में घुसी तो मुझे अपने पिता के पैर दिखाई दिए. मैं समझी कि मैं नीचे गिर डाउंगी. ममी दौड़ कर पापा के पास गईं. वो एक नीची पलंग पर बेहोश लेटे हुए थे. मेरी माँ ज़ोर से चिल्लाईं, 'जागो मीर जागो!"
"मैंने पापा के चेहरे को छुआ. मेरी उंगलियों पर उनका ख़ून लग गया. उनका चेहरा अभी भी गर्म था. मैं इतना घबरा गई कि मैं साँस नहीं ले पा रही थी. बाद में डॉक्टर ग़फ़्फ़ार ने मुझे बताया कि पापा साँस लेन की कोशिश कर रहे थे, लेकिन ले नहीं पा रहे थे."
"उनके गले में इतना ख़ून भर चुका था कि उनके फेफड़ों तक हवा पहुंचाने के लिए ट्यूब नहीं डाली जा सकी. बाद में उनके गले की नली में ट्यूब डालने के लिए छेद किया गया ताकि वो साँस ले सकें. ये सब हो रहा था कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा."
फ़ातिमा ने उनके अंतिम समय का वर्णन करते हुए 'सांग ऑफ़ ब्लड एंड सौर्ड' में लिखा, "पापा कमरे के बीचोंबीच लेटे हुए थे. एक सफ़ेद पतली चादर ने उनकी कॉलर बोन तक के हिस्से को ढ़ंक रखा था. उनकी आँखें मुंदी हुई थीं. उनके चेहरे और बालों पर सूखा ख़ून लगा हुआ था."
"पापा के बाल हमेशा करीने से बने होते थे. वो सिर्फ़ उस समय थोड़ा बिगड़ते थे, जब वो सुबह सो कर उठते थे. मैं अपने पापा के शव के बग़ल में घुटनों के बल बैठ गई और मैंने उनके चेहरे, गालों और होठों का चुंबन लिया."
"मैंने जानबूझ कर उनकी आँखों का चुंबन नहीं लिया क्योंकि लेबनान में एक अंधविश्वास है कि अगर किसी की आँखों की पलकों से आपके होंठ छुल जाएं तो वो हमेशा के लिए आपसे दूर हो जाता है. मैं अपने पापा से दूर होना नहीं चाहती थी."
अपने भाई की मौत की ख़बर सुनकर प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो तुरंत कराची पहुंचीं और नंगे पैर अपने मृत भाई को देखने मिड ईस्ट अस्पताल गईं.
बाद में लरकाना में उन्होंने एक भाव विव्हल भाषण देते हुए कहा, "1977 में जब मार्शल लॉ लगा और सेना सत्ता में आ गई, मीर मुर्तज़ा भुट्टो एक नौजवान शख़्स था. उसे मुल्क छोड़ना पड़ा. सेना की वजह से वो वतन लौट नहीं सके. वो अपने वालिद के आख़िरी दीदार से महरूम रहा."
"वो अपने छोटे भाई शाहनवाज़ को दफ़नाने के लिए भी नहीं आ सका और वो आज वो खुद हमारे बीच मौजूद नहीं है. मीर मुर्तज़ा भुट्टो इस दुनिया से रुख़्सत हो गया लेकिन वो हमारे दिलों में ज़िदा है और हमेशा ज़िदा रहेगा, क्योंकि शहीद कभी नहीं मरते हैं."
मुर्तज़ा भुट्टो के समर्थकों ने आरोप लगाया कि मुर्तज़ा को कराची की पुलिस ने योजना बना कर मारा था.
पुलिस ने पहले सड़क की बत्तियाँ बुझा दीं और फिर मुर्तज़ा के काफ़िले पर गोलियाँ चलाईं. पुलिस ने इसका खंडन किया.
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शुएब सडल ने कहा, "पुलिस भुट्टो के साथ आ रहे बंदूकधारियों को रोकने की कोशिश कर रही थी. जैसे ही उन्हें रुकने का इशारा किया गया, उन्होंने पुलिस पर गोली चला दी और पुलिस को आत्मरक्षा में गोली का जवाब देना पड़ा."
मुर्तज़ा की मौत कई सवाल खड़े कर गई जिनका जवाब आज तक नहीं दिया जा सका है.
5 दिसंबर, 2013 को इस हत्याकांड से जुड़े कई व्यक्तियों को बरी कर दिया गया, लेकिन मुर्तज़ा की बेटी फ़ातिमा इसके पीछे सत्ता से जुड़े कुछ लोगों को दोषी मानती हैं.
उनका कहना है, "ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को 1979 में मारा गया लेकिन उन्हें कभी न्याय नहीं मिला. शाहनवाज़ 1985 में मारे गए लेकिन कभी भी किसी को उनकी मौत का ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया."
"मेरे पिता मुर्तज़ा 1996 में मारे गए और 2009 में पाकिस्तान की एक अदालत ने ये कहा कि उन्हें किसी ने नहीं मारा. 2007 में बेनज़ीर रावलपिंडी में एक रैली में मारी गईं और इस पर कोई पुलिस रिपोर्ट भी नहीं की गई."
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